Thursday, February 22, 2018

795


1-भावना सक्सैना
1
गीत सुरीले
गाती है ये ज़िन्दगी
सुर पकड़
नए सृजन करो
मन आनंद भरो।
2
छाँव सुख की
नटखट बालक
चंचल दौड़े
नयन मटकाती
टिके नहीं दो घड़ी।
-0-
2-अनिता मण्डा
1
इच्छा के दीप
मन का गंगाजल
ले जाएँ लहरें
तैरते व डूबते
दिन-रात बीतते।
2
घूरती आँखें
गली चौराहों पर
भूली संस्कार
पोतें सभ्यता पर
कालिख़ दिन-रात।
3
छानते युवा
सड़कों की धूल
कर्तव्य भूल
अधर में भविष्य
वर्तमान हविष्य।
4
मन हो जाता
पत्थर से भी भारी
रहे डूबा सा
सुधियों की नदियाँ
कितनी उफनाता
-0-
3-पूनम सैनी (हरियाणा साहित्य अकादमी-परिष्कार  कार्यशाला की छात्रा)
1
अंगार- भरी,
चंदन- सी घाटी ये
तेरी ज़िन्दगी।
रोते या मुस्कुराते,
सफर तो तय है।
2
कुछ अपनी,
कुछ अजनबी-सी,
अनकही- सी,
दास्ताँ है वतन की।
वीरों के जतन की।
3
मेरी साँसों में
उसके जीवन का
एहसास है।
अब न मैं न ही वो,
बस प्रेम जीता है।
4
सीमाएँ भी है,
धर्म और जाति भी
ढूँढे न मिला  
आदमी की बस्ती में
इंसान है लापता।
5
पतझड़ में
बसंत न खिलता
बिन तुम्हारे।
आशाओं की बेल थी
हिम्मत के सहारे।
6
घुमड़ते-से
बादल बनकर
तुम आओ तो।
थार से मन पर
प्रेम बरसाओ तो।
-0-


Tuesday, February 20, 2018

794


जुगल बन्दी : माहिया 
डॉ सुधा गुप्ता : ज्योत्स्ना प्रदीप 
1
गरमाहट नातों की
डोरी टूट गई
भेंटों-सौगातों की।- डॉ.सुधा गुप्ता
0
डोरी तो जुड़ जाती 
सागर जान गया  
नदिया उस तक आती ।- ज्योत्स्ना प्रदीप  
2
अब आँसू सूख  चले
रेत -भरी आँखों
सपना कोई न पले ।- डॉ.सुधा गुप्ता
0
कुछ सीपी हैं बाकी 
मोती झाँक रहे 
कैसी प्यारी  झाँकी !  ज्योत्स्ना प्रदीप  
3
जाना था तो जाते
लौट न पाएँगे
इतना तो कह जाते ।- डॉ.सुधा गुप्ता
0
 फिर तुम तक आना है
तुझ  बिन जग झूठा 
सब कुछ वीराना है !  ज्योत्स्ना प्रदीप  
4
सब दिन यूँ  ही बीते
बाती से बिछुड़े
हैं दीप पड़े रीते ।-डॉ सुधा गुप्ता
0
अब मिलने की बारी 
बाती   दीप  धरी 
जलने की तैयारी ।- ज्योत्स्ना प्रदीप  
5
अब नींद नहीं आती
रातें रस- भीनी
कोरी आँखों जाती ।- डॉ .सुधा गुप्ता
0
आँखें ना कोरी हैं 
देखो रस  बरसा 
वो चाँद चकोरी हैं।- ज्योत्स्ना प्रदीप
6
जब चाहो तब मिलना
पर यह वादा हो
फिर सितम नहीं करना ।- डॉ .सुधा गुप्ता
0
ये सितम नहीं गोरी 
कुछ मजबूरी थी 
बस  इतनीं -सी चोरी ।-ज्योत्स्ना प्रदीप  


Saturday, February 17, 2018

793


 1-सुनीता काम्बोज
1
मरी इच्छाएँ
आज फिर जी उठी
तुम्हें निहार
मन लगा है गाने
 मैं लगी हूँ मनाने ।
2
जीवन- रंग
चुरा ले गए तुम
कहाँ जा छुपे!
बोले नहीं बुलाए
बैठी आस लगाए।
3
नींव की नमी
कमजोर करती
सभी दीवारें
काँपती इमारत
बचाने की सोच लो।
4
मीन समझे
ताल को  समंदर
गाए महिमा
निकली न बाहर
समझाना बेकार
-0-
2-कमला निखुर्पा
1
भोर की दौड़
थी साँझ तक चली 
होड़-सी मची
साथी रूठते गए
पीछे छूटते गए।
2
मंजिल वहाँ
जिसे ढूँढने चले
गुम हो गए
वो कदमों के निशाँ,
पर रुकना कहाँ ।
-0-
3-कृष्णा वर्मा
1
रात औ दिन
हाथ में मोबाइल
बातों में मग्न
तन-मन को घेरे
फिर एकाकीपन।
2
तरीके तौर
गए  सब बदल
मरे संस्कार
इंसानी रिश्ते में जो
आया मंदी का दौर।
-0-
(16 फरवरी-18)
1
थके पाँव थे
दूर-दूर गाँव थे
सन्नाटा खिंचा,
लगा कुछ न बचा-
कि आप मिल गए
2
राहें कँटीली
चुभन व कराहें
बाधाएँ बनी
पास में  ही छाँव थी
कि फूल खिल गए।
3
तलाशा जिसे
भोर से साँझ तक
सूखा हलक
नदी- तीर पर मिले
मन दोनों के खिले।
4
रेत -सी झरी
भरी -पूरी ज़िन्दगी
कुछ न बचा
था सुनसान वन
कि पार था चमन ।
5
भोर -सी मिली
साँझ -सूरज  हँसा
कि आज कोई
आके  मन  में बसा
वह भोर थी तुम्हीं ।
6
घेरते रहे
बनके रोड़े कई
हारने लगे
जब अकेले पड़े
तुम साथ थे खड़े।
7
कामना यही-
जब तन में बचे
साँस आखिरी
अधरों पे हास हो
सिर्फ़ तुम्ही  पास हो।
8
मुट्ठी में कसा
बस तेरा हाथ हो
सदा साथ हो
जितनी  साँसें  बचें
कुछ नया ही रचें।
-0-