Saturday, July 22, 2017

771

कृष्णा वर्मा

शब्द कमाल
हिलें ना डुलें पर
चलते ऐसी चाल
बे हथियार
सहज कर देते
जुदा रिश्तों से प्यार।

मरी है शर्म
कैसे करें बयान
सूखा आँख का पानी
ढोएं माँ-बाप
ज़िम्मेदारियों का बोझ
च्चों  की मनमानी।

कैसा ज़माना
बदले हैं अपने
मरे हैं अहसास
पीड़ा ना दर्द
रिश्तों की टूटन क्यों
चुभती नहीं आज।

होंठों पे ताला
घुटा-घुटा जीवन
जीता आज ज़माना
पहचाना भी
लगे अब अंजाना
मन हुआ सयाना।

खोया है कहाँ
ढूँढें दिशा-देश में
अपना बचपन
जिस गली में
फुर्स जैसे  ऊँचे
थे अपने मकान।

-0-

Sunday, July 2, 2017

770

     पुष्पा मेहरा 
          
     स्याह रात है
    जाग आया है चाँद
    आज ईद का,
    मात्र चाँद ही नहीं
    संदेशा है ये
    प्रेम-भाईचारे का ,
    रोशनी मात्र !
    प्रात और रात का
    हरती तम
    पर कटार
    ज्ञान की सदा ही
    काटे जड़त्व,     
    यह मन हमारा
    है तानाशाह
    सुनता और करता
    सदा मन की ,
         भेद नीति अपना
    गाड़े स्तम्भ
    अपनी नीतियों के
    चले कुचालें
    जाल धर्मान्धता का
    बिछा कर ये 
    छलता जनता को
    प्रेम-दिखावा 
    पानी में परछाईं
    बना छलता
    गले लगाने बढ़ो
    तो फिसलता         
    पर अबकी चाँद
    अंधकार में
    उजाला साथ लाया 
    देगा खुशियाँ
    तोड़ देगा दीवार
    नफरत की
    मिलेंगे गले सब
    तोड़-खंजर,
    चाँद -सा होगा मन
    हर पल रोशन        

          -0-       

Friday, June 16, 2017

769

सेदोका
1-भावना सक्सैना
1
बदला नहीं
वो जमाने के संग
हर रंग बेरंग,
कहता रहा
जो भी हो दस्तूर
मिलना है रूर।
2
सुधि- निर्झर
बहता कल -कल
सहलाता है मन,
वेदना- सिक्त
दुष्कर से क्षणों में
बनता आलंबन।
3
यादों के मोती
भरे दिल के सीप
कितने ही सालों से,
यादें सरल
निष्कपट, दूर है
जग की चालों से।
4
जीवन -संध्या
विश्लेषण के पल
अनुभव के बोरे,
विचारमग्न,
दूर चले कितने
रहे फिर भी कोरे।
5
जीवन -माला
गुज़रते वर्ष हैं
मनके सुनहरे,
मन के धागे
नित रहें  बाँधते
नूतन संगी मेरे।
-0-
ताँका
सुनीता काम्बोज
1

पगला मन
आशाओं का खिलौना
खेलता रहा
भ्रम के ही तूफान
नित झेलता रहा ।
2
कानन घना
तम और सन्नाटा
पसरा रहा
जीवन में सभी तो
बिन बोले ही कहा
3
पूर्ण आशाएँ
तृप्त हर सपना
तृष्णा संन्यासी
माया रही अछूती
फिर क्यों ये उदासी ?
4.
अबूझ लगी
पहेली जीवन की
करूँ प्रयास
सुलझेगी ज़रूर
मन  में बची आस
5
रूप है रोया
मार कर दहाड़
किस्मत हँसी
होठों पर मुस्कान
सिर्फ़ समय जीता ।
6
ज्ञान की बूँद
ह्रदय में बहती
है मिथ्या भ्रम
अभिमान जगाए
खुद के गुण गाए।
7
चिता जलती
यादों की फिर आज
कपट का कफ़न
धू -धू -धूकर जला
प्रपंच छोड़ चला।

-०-                        

Thursday, June 8, 2017

767

1-कमला  निखुर्पा
1
थी मैं अभिधा 
गिनाए जो तुमने
लक्षण मेरे 
बन गई व्यंजना 
खुद को पहचाना ।
-0- 
2-रामेश्वर काम्बोजहिमांशु
1
मैं निरुत्तर
तेरा नेह-विस्तार
धरा से नभ
नहीं पा सका पार
भिगो रही बौछार ।
-0-
रमेश कुमार सोनी  
1
नदी अकेली
प्यास बुझाने दौड़ी
बस्ती बसाती
प्रदूषित हो जाती
बचाओ नहीं बोली
2
धूप की कूची
भित्ति चित्र पेड़ों के
रोज बनाती
सदा से ही अधूरी
छोटी –बड़ी हो जाती

-0-

Thursday, June 1, 2017

766

रेखा रोहतगी
1
जो उनसे अनबन  है
रूठूँ  या मानूँ

दिल में ये उलझन है
 2
 
तुमने मारा ताना
 
तीर धँसा दिल में
 
तुमने ये कब जाना
 3
 
जो बात नहीं जँचती
 
लाख जतन कर लूँ
 
वो बात नहीं  पचती
4
 
मैं गुस्से में ऐंठी
जाते देख उसे
सब मान भुला बैठी

Monday, May 29, 2017

765

माहिया : डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 
1
आँखों बरसात हुई
वीर शहीदों से
सपने में बात हुई । 
2
बोला इक मत रोना 
दिल के दाग़ सभी 
आँसू से मत धोना ।
3
थोड़ा समझा देना 
संदेशा मेरा 
घर तक पहुँचा देना । 
4
माँ ! सुत था अलबेला
वैरी की गोली
छाती पर हँस झेला । 
5
बाबा कब हारे हैं 
ये मेरे साथी 
सब पुत्र तुम्हारे हैं । 
6
उस गुड़िया से कहना 
तू मजबूर नहीं 
बन योद्धा की बहना । 
7
कहना ना हरजाई
लिपट तिरंगे में 
जब घर लौटे भाई ।
8
हाँ फ़र्ज़ निभाया है 
माटी का हमने 
बस क़र्ज़ चुकाया है ।
9
कह देना प्यारी से 
राह तके मेरी 
इकटक सुकुमारी से ।
10
क्या पूछो कैसी है 
वो मेरी चाहत 
फूलों के जैसी है ।
11
हाथों भर हो चूड़ा 
सिन्दूरी बिंदी 
महके गजरा जूड़ा । 
12
वादा  ना निभ पाया 
कहकर भी मिलने 
मैं लौट नहीं आया । 
13
थोड़ी मजबूरी थी 
सीमा की रक्षा 
भी बहुत ज़रूरी थी । 
14
विनती है ,सुन लेना 
साँसों की डोरी 
ख़ुशियों को चुन लेना । 
15
है उम्र अभी छोटी 
मुश्किल है सहना 
जग की नज़रें खोटी । 
16
काँटो पर मत चलना 
जीवन की भट्टी 
यूँ ठीक नहीं जलना । 
17
होनी से खुद लड़कर
चुन लेना साथी 
कोई आगे बढ़कर । 
18
तड़पी ,फिर बोल गई 
मन की सब पीड़ा 
रो-रो कर खोल गई ।
19
कैसे कायर माना
क्यों ,मनमीत कहो
मुझको ना पहचाना । 
20
पूरी तैयारी है 
तेरा क़र्ज़ चुका 
अब मेरी बारी है ।
21
पीछे तो आना था 
नन्हे को लेकिन 
फ़ौलाद बनाना था । 
22
मैं वचन निभाऊँगी 
माँ-बाबा मेरे 
हर सुख पहुँचाऊँगी ।
23
बहना का ज़िक्र करो 
ख़ूब सजे डोली 
उसकी मत फ़िक्र करो । 
24
पक्की है नींव बड़ी
सुन लेना ,प्यारी
सरहद पर आन लड़ी । 
25
जब लाल बड़ा होगा 
बन दीवार अटल 
सरहद पे खड़ा होगा । 
26
वो पल भी आएँगे
नभ के तारों में 
हम संग मुस्काएँगे । 
27
सुनकर मन डोल गया 
जय उन वीरों की
सारा जग बोल गया । 
-0-